सत्रांत की परीक्षा समाप्त करके गाँव लौटा था। दस दिन की छुट्टी की घोषणा हुई थी। घर-परिवार और समाज की दुनियादारी में दस दिन ऐसे बीत गए, जैसे पुल से ट्रेन गुज़र जाती है। फिर वापस लौटने की तैयारी शुरू हुई। माँ ने सफ़र में खाने के लिए नमकीन और पेड़े बनाए। बहनें अपने तीनों भाइयों के लिए राखियाँ और मिठाई खाने के लिए कुछ नक़द राशि बैग में रख रही थीं। रक्षाबंधन अगले हफ़्ते ही था। एक छोटा भाई हमारे साथ रहकर एमबीए कर रहा था, जबकि दूसरा हम सबसे लगभग पाँच सौ किलोमीटर दूर इंदौर में रहकर काम कर रहा था।
सुबह राजगीर से वाराणसी और 04:30 बजे से बुंदेलखंड एक्सप्रेस के स्लीपर क्लास प्रातः 07:30 तक ग्वाल ऋषि की भूमि ग्वालियर। फिर अपनी पुरानी दिनचर्या पर सुबह नौ बजे से पाँच बजे तक कॉलेज। कमरे पर लौटकर पीपीटी, आईटिनरेरी डिजाइनिंग और स्वाध्याय का समय, खाना-पीना और आराम और फिर से पुनरावृत्ति। आज दोपहर के खाने के बाद कॉलेज से जल्दी छुट्टी मिल गई, रक्षाबंधन पर्व के लिए अगले चार दिन तक छुट्टी मिली। कैंटीन में ही बैठे छोटे भाई को कॉल पर बताया कि अगले चार दिन की छुट्टी मिली है, उसने भी अपनी छुट्टी की बात बताई और फिर प्लान बन गया इंदौर का। भाई ने ट्रेन सर्च कर बताया, संध्या लगभग पाँच बजे इंदौर इंटरसिटी ग्वालियर से खुलती है, चलना है तो जल्दी कमरे पर लौट आइएगा।
कमरे पर लौटते ही अपने बैग की पैकिंग शुरू और भाई ने अपना तैयार कर रखा था। समय कम थी, ऑटो पकड़कर स्टेशन पर फिर पूछताछ केंद्र और पता चला कि इंदौर इंटरसिटी धीरे-धीरे सरक रही है। अंततः ट्रेन प्लेटफॉर्म छोड़ चुकी थी और हम दोनों भाई पिछली बोगी के एक्स निशान को ओझल होते देख रहे थे। फिर थोड़ी लंबी साँस के साथ बैठ गए प्लेटफॉर्म की कुर्सी पर।
घर से निकल ही गए हैं तो अब चला जाए बस अड्डा, अभी बहुत बस मिलेगी इंदौर के लिए; मैंने कहा। फिर हम दोनों ऊपरी पुल पार कर उस पार बस अड्डा पहुँचे।
बस में कुछ सवारियाँ बैठी थीं और कंडक्टर गेट पर खड़ा होकर और सवारियों का इंतज़ार कर रहा था। बस वोल्वो स्लीपर थी, सो हम दोनों ने पहले बस खुलने का समय पूछा—09:30 बजे तक खुलेगी। अभी एक-डेढ़ घंटे का समय बचा रहा था, भाई ने कुछ खाने की इच्छा जाहिर की। पास के ही ढाबे पर जाकर रोटी और तड़का खाकर बस में लौट आया था। बरसात का मौसम होने के कारण बस में उमस जैसा लग रहा था, फिर भी टिकट लेकर अपनी सीट रिज़र्व कर लिया और बैग टिकाकर बैठ गए। अंततः बस अपने निर्धारित समय से अड्डे से निकली और महारानी लक्ष्मीबाई मार्ग होते हुए मुंबई-आगरा हाईवे के ग्वालियर-शिवपुरी रोड पर थी। आधे घंटे चलने के बाद बस वाले ने रोड के एक साइड में लगाकर रोक दिया। बस में ज़्यादातर सवारी पुरुष ही थे, उम्र कहें तो सभी बीस और तीस के बीच के थे। अधिकांश लोग राज्य पुलिस के जवान प्रतीत हो रहे थे, जो अपने घर पर रक्षाबंधन मनाने के लिए भागे थे या छुट्टी में जा रहे थे। महिला सवारी बस नाम मात्र तीन, एक महिला, एक सोलह वर्ष की नवयुवती और एक छोटी-सी लड़की पाँच वर्ष की। शायद ये तीनों भी राखी बाँधने के प्रयोजन से घर से निकली थीं। सभी की निगाह उस ओर अनायास ही चली जाती थी। सब उन तीनों की यथासंभव मदद कर रहे थे।
बस रुके हुए एक घंटा होने को था, सो हमने कंडक्टर से पूछा, क्यों भाई, गाड़ी रुकी हुई क्यों है? सर, एक और सहायक चालक आने वाला है, बस उसी का इंतज़ार कर रहे हैं। अचानक एक बाइक आकर बस के समीप रुकी और दो में से एक आदमी लड़खड़ाते हुए उतरा और बस चालक की ठीक बाईं सीट पर लुढ़क गया। शायद शराब के नशे में था, पता चला कि इसी का इंतज़ार किया जा रहा था।
बस फिर से दौड़ने लगी थी, रात के ग्यारह से ऊपर का समय घड़ी बता रही थी। सब सवारियाँ ऊँघने लगी थीं, स्लीपर पर आधे से अधिक लंबे होकर पैर पसार लिया था। हल्की बरसात भी शुरू हो गई थी। बस के सन्नाटे को वह शराबी कभी-कभी ड्राइवर से कुछ बड़बड़ाते हुए बातें करके भंग कर रहा था। बस अँधेरे को चीरते हुए अपनी रफ़्तार से दौड़ रही थी। माधव राष्ट्रीय उद्यान के आसपास गुज़र रही थी, तभी कुछ जागे लोगों को कुछ महकने का आभास हो रहा था। शायद डीज़ल कहीं से लीक कर रहा था, वही महक रहा था। सड़क के किनारे लगाकर कंडक्टर बस के नीचे झुककर मोबाइल टॉर्च से कुछ देखने की कोशिश कर रहा था और बोला, उस्ताद, डीज़ल ही महक रहा है, लगता है इंजन के पास से लीकेज हो रहा है। बस फिर से दौड़ने लगी थी। आधे घंटे के बाद फिर रुक गई। सब जग गए, लगे हो-हल्ला करने, अब क्या हो गया? ड्राइवर ने बताया, इंजन की डीज़ल पाइप फट गई है, ईंधन काफ़ी बर्बाद हो रहा है, शायद अब बस को चलाना मुनासिब नहीं है। अब तो बस के अंदर और हल्ला करने लगे सब। लेकिन सनसनाती रात और वीरान जंगल के बीच बस फँसी हुई थी। सो सब धीरे-धीरे फिर से सो गए।
सुबह के साढ़े चार बजे थे। ड्राइवर ने फिर सेल्फ मारकर बस को स्टार्ट किया और धीरे-धीरे सरकाते हुए एक पेट्रोल पंप पर पार्क कर दिया और आसपास में मैकेनिक का पता लगाने लगा। दुकान के शटर पर लिखे मोबाइल नंबर पर संपर्क किया। घंटी बज रही थी, लेकिन कोई जवाब नहीं मिल सका। फिर कोशिश कर नंबर लगाया तो बात हुई और पता चला सुबह छह बजे तक ही संभव हो पाएगा कि मैकेनिक आ जाए। कुछ रंगरूट, जिनके गाँव आसपास में थे, ट्रक आदि में सवार होकर निकल दिए। बच गए जिनका घर इंदौर के समीप था या जिन्हें इंदौर तक जाना था। खैर, सुबह हुई और मैकेनिक आया और अपने हुनर से बस को बना दिया। बस चलना शुरू कर दी। सुबह की चाय-नाश्ते के साथ सब लोग इत्मीनान होकर अपने गंतव्य जल्दी पहुँचने को पड़े थे। सबके फोन बजने लगे थे, कब पहुँच रहे हैं। हमारा मुन्ना भाई भी फोन कर पूछा कि कहाँ पहुँचे, बोले कि कोई शहर मिलता है तो बतलाता हूँ।
एक शहर रास्ते में मिला, नाम था ब्यावरा। पेट्रोल पंप पर बस लगाकर ड्राइवर ने कहा कि रात में ईंधन हद से ज़्यादा बर्बाद हो गया है, सो डीज़ल भरवाना पड़ेगा। ड्राइवर और कंडक्टर आपस में उलझे रहे कि कैसे डीज़ल भरवाया जाए। ड्राइवर बार-बार कंडक्टर से कह रहा था, जो तुम्हारे पास रास्ते के खर्च के लिए बस मालिक ने ग्यारह सौ रुपये दिए हैं, दे दो, भरवा देता हूँ, पर कंडक्टर मानने को तैयार ही नहीं हो रहा था। हम सबको गुस्सा अब आना शुरू हो गया था। कौन-सी अजीब बस के चक्कर में हम सब फँस गए हैं! बात नहीं बनती देखकर हम सभी ने कंडक्टर पर दबाव बनाया कि चलो, इंदौर पहुँचकर पहले तुम्हारा पैसा दिलवाकर हम सब कहीं निकलेंगे। बारिश ने अलग नाक में दम कर रखा था। दिन के दोपहर बारह बज चुके थे, फिर से भूख-प्यास होने लगी थी, अब सब चिढ़ने लगे थे। खैर, कंडक्टर को दया आई और डीज़ल भरवाने को राज़ी हुआ।
बारिश ने सड़क को भी दयनीय बना दिया था। खैर, फिर से बस चलना शुरू हो गई। अब तो वही रिज़र्व वाला शराबी ड्राइवर स्टेयरिंग संभाल लिया था। अब सब नॉर्मल थे, बस जल्दी पहुँचा दे हम सबको। दिन के तीन बज गए थे। ब्यावरा से दो-ढाई घंटे आगे बढ़ चले थे, तभी आगे लंबा जाम दिखाई पड़ रहा था। डेढ़-दो घंटे जाम में फँसे रहे, तब जाकर पता चला कि आगे कोई बरसाती नदी पर बने पुल से भी ऊपर पानी का बहाव हो रहा है। पानी के नीचे उतरने का इंतज़ार किया जा रहा है, तभी आगे जाना संभव हो पाएगा। एक नया सिरदर्द हो गया था। लोग बस से उतरकर नदी को देखने जाने लगे तो हम भी उतरे, चलो भाई, देखें माजरा क्या है। लगभग एक किलोमीटर पैदल चलने पर देखा तो सही में नदी उमड़ रही थी। किसी की हिम्मत काम नहीं कर रही थी, तब हारकर फिर लौट गए अपनी बस पर। कोई दूसरा उपाय भी नहीं सूझ रहा था। शाम के पाँच बजने वाले थे, लेकिन मौसम खराब होने के कारण संध्या पैर पसारने लगी थी। सभी के सब्र का बाँध टूटने लगा था।
हम सब सवारी ड्राइवर पर दबाव बनाने लगे कि कोई और वैकल्पिक मार्ग पर चला जाए, भले क्यों न दो-चार घंटे और चलना पड़े। पर ड्राइवर राज़ी नहीं हो रहा था। गुस्सा अब बर्दाश्त से बाहर हो रहा था और बचे हुए रंगरूट वहीं ड्राइवर से उलझ गए, जो झूमते हुए रात में बस पर चढ़ा था। कुछ दिए सब मिलकर और जबरदस्ती गाड़ी घुमाने को कहा। गाड़ी फिर से चलने लगी। एकाध घंटे चलने के उपरांत फिर से लाइन होटल पर गाड़ी खड़ी हुई और कंडक्टर बोला, जिस किसी को खाना-पीना है, खा-पी लें क्योंकि अब गाड़ी एक सिंगल रोड में जा रही है, पता नहीं कब जाम मिल जाए। सबने अपनी पसंद का खाना खाकर फिर बस में सवार हो गए। अब तो और डर के माहौल में हम सब भगवान का नाम लेकर आगे बढ़ रहे थे। उधर से आने वाले फोन एक अलग तरीके से सभी को तंग कर रहे थे। पता नहीं किस जन्म का हिसाब वसूला जा रहा था।
गाड़ी का ड्राइवर भी जोखिम उठाकर चला रहा था। अब इंदौर पहुँचाकर ही दम लेंगे, लेकिन नियति को कुछ और ही मंज़ूर था। डीज़ल फिर से ख़त्म। रात के ग्यारह बज रहे थे। फिर से गाड़ी पेट्रोल पंप पर लगा दिया गया। अब कौन डीज़ल भरवाए?
इंदौर ऑफिस में कंडक्टर ने फोन मिलाया और बोला, मालिक, डीज़ल ख़त्म हो गया है। पैसे लेकर आ जाते तो सही होता, सभी सवारी एकदम परेशान हो गए हैं। पर नकारात्मक उत्तर से हम सबकी नज़रों से ओझल होकर कहीं चला गया, सोने। हम भी मसोसकर सो गए। सुबह मालिक अपनी छोटी गाड़ी से आकर डीज़ल भरवाया और ड्राइवर और कंडक्टर सबको लताड़ लगाई। फिर हम सुबह के नौ बजे लगभग इंदौर पहुँच गए। पर इंद्रदेव रुकने का नाम ही नहीं ले रहे थे। इंदौर पहुँचकर अपने भाई से मिलते ही सब थकान छूमंतर। फ्रेश होकर खाना-पीना हुआ, फिर आराम से चादर तानकर सो गए। तीन बजे उठकर फिर सफ़र की आपबीती बताई, घर समाचार, सब किस्सा-कहानी। अगले दिन रक्षाबंधन थी। हम तीनों भाइयों ने आपस में एक-दूसरे की कलाई पर बहन की भेजी हुई राखी बाँधकर मिठाई खाई। संध्या में राजबाड़ा भी घूमने गए।
और हाँ, इंदौर में ही रहकर हमारे गाँव का एक और लड़का छोटू इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहा था। वह भी मिलने को कहा था, पर बारिश ने उसको भी कमरे में कैद कर दिया था। खैर, अगली सुबह इंदौर स्टेशन पर मिलकर ख़ूब खुश हुआ। बोला, भैया, अगर बारिश नहीं रहती तो हम सभी मिलकर एक साथ मज़े करते। पर अब अपनों से बिछड़ने वाले थे। वही इंदौर इंटरसिटी एक्सप्रेस अपनी सीटी बजाकर हम दोनों भाइयों को ग्वालियर ले चलने को गिड़गिड़ा रही थी।
सफ़र ने सिखा दिया कि अपने आप में शांत चित्त के साथ सवार हो जाइए समय के पहिए पर। अपनों से मिलने की चाहत में एक जन्म का क्या, कई जन्मों का सफ़र कम ही होगी।
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