Uniform Civil Code: क्या समान नागरिक संहिता असंवैधानिक है? | खरी-खरी with Pooja Varma

समान नागरिक संहिता संवैधानिक है या असंवैधानिक ? लोकतांत्रिक है या अलोकतांत्रिक ? इससे किसको फायदा है? किसको नुकसान है ? इसी मुद्दे पर आज बोलूंगी खरी- खरी ।

22वें लॉ कमीशन ने भारतीय नागरिकों से यूनिफॉर्म सिविल कोड यानी समान नागरिक संहिता पर सुझाव मांगे हैं ।14 जून को जारी इस सूचना में 30 दिन के अंदर सुझाव देने को कहा गया है। ज़रूरत है कि हमारे देश की नई पीढ़ी इस विषय पर जागरूक हो ताकि विवेकपूर्ण सुझाव दे सके। जब से यह मुद्दा उठा है विपक्ष ,जिसमें कांग्रेस और अखिलेश यादव की पार्टी सपा प्रमुख है, धुआंधार विरोध कर रहे हैं और इसे असंवैधानिक बता रहे हैं , अलोकतांत्रिक बता रहे हैं , बीजेपी की मनमानी बता रहे।

समान नागरिक संहिता संवैधानिक है या असंवैधानिक ? लोकतांत्रिक है या अलोकतांत्रिक ? इससे किसको फायदा है? किसको नुकसान है ? इसी मुद्दे पर आज बोलूंगी खरी- खरी ।

पहले समझते हैं कि यूनिफॉर्म सिविल कोड आखिर है क्या। आपको मालूम है कि हमारे देश के आपराधिक मामलों के लिए यूनिफॉर्म लॉ है यानि चोरी हत्या डकैती मारपीट बलात्कार  इत्यादि अपराधों के लिए भारत के सभी नागरिकों पर एक समान दंड संहिता लागू होती है जिससे इंडियन पीनल कोड या भारतीय दंड संहिता के नाम से जानते हैं । इस कानून के तहत फर्क नहीं पड़ता कि कोई भी अपराधी किस धर्म, जाति ,लिंग या प्रदेश का है या अपराधी की भाषा क्या है। लेकिन सिविल लॉ के मामले में ये बात अब तक नहीं लागू होती है। भारतीय नागरिकों के सिविल अधिकार  CPC यानि Civil Procedure code  के तहत आते हैं जिसमे शादी , तलाक, संपत्ति का बंटवारा ,उतराधिकार  जैसे  पारिवारिक मामले धर्म के अनुसार अलग-अलग कानून से guided होते चले आ रहे हैं ।

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हिंदू धर्म जिसमें सिख,जैन और बौद्ध संप्रदाय भी शामिल हैं हिंदू विवाह अधिनियम 1955 से निर्धारित होते हैं। ईसाइयों के लिए इंडियन क्रिश्चियन मैरिज एक्ट 1872 ,इसी तरह पारसी मैरिज एंड डायवोर्स एक्ट 1936 बने हुए हैं। Muslim personal law 1937 के  अनुसार मुसलमान इन मामलों में शरीयत को follow करते हैं।

यदि यूसीसी लागू होता है तो हर धर्म जाति को विवाह, तलाक आदि में  संपत्ति में एक जैसा अधिकार मिलेगा और एक सी कानूनी प्रक्रिया से गुजरना होगा। आप बताइए अगर किसी लोकतंत्र में अपने सभी नागरिकों को समान रूप से रखा जाता है तो वह लोकतंत्र कमजोर होगा या मजबूत होगा ? अगर किसी लोकतंत्र में महिलाओं को समान रूप से सुरक्षा मिलती है ,अधिकार मिलता है तो लोकतंत्र टूट रहा है या बुलंद हो रहा है?

अब जानते हैं कि यूसीसी कितना असंवैधानिक है। तो आपको जानना चाहिए कि संविधान के नीति निर्देशक तत्व में इस बात की स्पष्ट अनुशंसा यानि recommendation है कि भारत में यूनिफॉर्म सिविल कोड लाया जाएगा। संविधान निर्माता भीमराव अंबेडकर चाहते थे कि भारत सरकार जल्द से जल्द समान नागरिक संहिता लागू करें।  समान नागरिक संहिता असल में संविधान द्वारा अनुशंसित पहले से तय प्रक्रिया है इसलिए ये शुद्ध संवैधानिक है।अनुच्छेद 44 में कहा गया है समान नागरिक संहिता लागू करना सरकार का दायित्व है। लेकिन 50 सालों तक कांग्रेस की सरकार  वोट बैंक और तुष्टिकरण नीति के चक्कर में इसे  टालती रही क्योंकि इससे मुसलमानों का एक वर्ग नाराज हो जाएगा।

अब यह सोचिए आज भी यूनिफॉर्म सिविल कोड से किसे तकलीफ है ? हिंदू विवाह अधिनियम 1955 में तो समय के साथ हमेशा बहुविवाह, तलाक, मेंटेनेंस ,संपत्ति पर पुत्री का अधिकार इत्यादि कई मुद्दों पर संशोधन होते रहे हैं।हिंदू विवाह अधिनियम के तहत एक बीवी के रहते दूसरा विवाह गैरकानूनी है, पारसी ऐक्ट में भी पहले ही बहुविवाह को प्रतिबंधित किया जा चुका है। ईसाइयों में भी एक ही विवाह कानूनी है।तो तकलीफ सिर्फ उन्हें है जो एक साथ चार बीवियां रखने के शौकीन हैं, जो जब चाहे तलाक देने में शान समझते हैं, जिन्हें औरतों के साथ हलाला करने की और जब चाहे मुताह यानी टेंपरेरी मैरिज की सुविधा छिनती हुई दिख रही है। इन लोगों को हिंदुओं से सीखना चाहिए । हिंदू धर्म में तो बहुपत्नी की प्राचीन परंपरा रही है ।चार ही नहीं अनगिनत पत्नी रखने के लिए भी धर्म की स्वीकृति मिली हुई है। लेकिन हिंदू विवाह अधिनियम में संशोधन कर इस पर स्वयं हिंदुओं ने प्रतिबंध लगाया। वैसे सच्चाई ये है कि मुस्लिमों का सिर्फ एक वर्ग इससे दुःखी है। जो मुस्लिम परिवार इन सब से पहले ही मुक्त हो चुके हैं तो उन्हें यूसीसी क्यों बुरा लगेगा? वह क्यों नहीं चाहेंगे कि उनका पूरा समुदाय इस से मुक्त हो सके और जाहिर सी बात है कि यदि मुस्लिम औरतों को 3 सौतनो और एक दर्जन सौतेले बच्चों से मुक्ति मिलेगी तो उन्हें दर्द होगा? जिन मुस्लिम बेटियों, बीवियों को संपत्ति में अधिकार मिलेगा,आर्थिक सुरक्षा  मिलेगी तो उन्हें बहुत दुख होगा क्या या खुशी होगी?

खरी- खरी बोलूं तो जो लोग शरीयत की दुहाई देते हैं ना कि शरीयत नहीं छोड़ सकते उनसे पूछा जाना चाहिए कि शरीयत का जो आपराधिक दंड विधान prescribed है उसे आपने कैसे और क्यों छोड़ दिया? क्रिमिनल मामलों में तो आपको आईपीसी से कोई परहेज नहीं ? वरना शरीयत के अनुसार तो चोरी करने वालों के हाथ काट दिए जाने चाहिए, शादी से पहले प्रेम संबंध बनाए तो सरे आम भीड़ के हाथो पत्थर मार मार कर जान ले लेनी चाहिए।। लेकिन वहां तो आप संविधान के तहत सुविधा का कानून चाहते हैं, शरीयत को कहां अपनाते हैं? अगर पूरी तरह शरीयत लागू कर दिया जाए तब तो चोर अगर हिंदू है तो जेल जाएगा और मुस्लिम है तो हाथ काट दिए जाएंगे। इसलिए यह दलील देने वाले अपना मुंह बंद ही रखें तो अच्छा है ।यही मुस्लिम बन्धु जब यूरोप और अमेरिका में रहते हैं तो समान कानून का पालन करते हैं। सिर्फ भारत में ही ऐसे ख्याल आने लगते हैं।


मुझे पूरा विश्वास है कि भारत का मुसलमान भारत में इसलिए खुश है क्योंकि वह एक सशक्त लोकतंत्र का नागरिक है जहां कानून की नजर में सब एक है। मुझे विश्वास है कि आज के मुस्लिम नवयुवक- युवती कभी नहीं चाहेंगे कि वह अपनी तरक्की और अपनी आजादी का रास्ता छोड़कर किसी दायरे में सीमित रहने को मजबूर हो। समान नागरिक संहिता भारत की जरूरत है।


बीजेपी के घोषणापत्र में प्रारंभ से ही यूनिफॉर्म सिविल कोड लाने का वादा किया जाता रहा है। जिस तरह कश्मीर से धारा 370 हटाने का वादा किया गया था। जिस तरह राम मंदिर बनवाने का वादा किया गया था। यह तीन बातें ऐसी थीं जिन पर कांग्रेस हमेशा नरेंद्र मोदी को ललकारती रही कि कभी नहीं पूरा होगा। पर हम सब जानते हैं कि इनमें से दो असंभव लगने वाले वादे पूरे हो चुके हैं।
आप सब 13 जुलाई 2023 के पहले Law Commission of India के website (click here) पर जाकर बताए गए जगह पर click कर के अपनी राय दर्ज कर सकते है। या फिर दिल्ली में  इस पते पर Member Secretary, Law Commission of India, 4th Floor, Loknayak Bhawan, Khan Market, New Delhi - 110 003

अपने लिखित सुझाव submit कर सकते हैं। आपके सुझाव में दम हुआ तो लॉ कमीशन आपसे व्यक्तिगत संपर्क कर सकता है या आपको बुला कर आपके साथ चर्चा भी कर सकता है l

जय हिंद।

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