
आज बड़े दिनों बाद एक कहानी लिखने की इच्छा जागी , और इसकी एक वाजिफ वजह भी रही मगर मेरे हिसाब से , सही में वजह वाजिफ है या नहीं मुझे नहीं पता और सभी चीज़ें जस - की - तस जानने का शौक भी नहीं , चुकी इन हल्के सालों मै यह समझ चुका हूं की अगर मैने उसकी सभी चीज़ें उसके सत्य रूप में जान ली तो मेरा पेट खराब हो जाएगा , चुकी दिमाग मुझमें खराब होने लायक पर्याप्त मात्रा में है नहीं ! एक सर्द रात करीब 12:00 रहे होंगे जो कि रोज बजते हैं , मगर आज कुछ तो खास है दिन जाती हुई गर्मी में हल्की बरसात की बूंदे वाले रहे थे सितंबर जाने को और अगला महीना आने को आतुर ऐसा लगता है कि बादल सितंबर के जाने का मातम मना रहे थे। अपना शोक दिखाने खातिर मद्धम -मद्धम पानी बहा रहे थे । उसी रात गर्मी से भारी राहत रही और जरा सर्द भी महसूस हुई तो सोचा पंखा बंद कर दूं, हालांकि 5 मिनट सोचा कि गर्मी के मौसम पंखा बंद करूंगा तो लोग क्या कहेंगे मगर फिर जैसे ही मैंने अपना मोबाइल खोला तो उस पर किशोर दा की कुछ तो लोग कहेंगे अपने आप चलने लगी और अंत में पांचवें मिनट याद आया कि वह लोग तो अभी अपने घरों में बिस्तर बंद होंगे तो मैने मेरे समाज के अरे!, माफ करना मेरे निपट आवारा समाज के मुंह पर लात रख उस पंखे को जा बंद किया । कुछ समय तो मैं इधर-उधर में बिता रहा था , इसी असमंजस में की चादर ओढ़ लूं या नहीं चुकीं सुबह अगर धूप हो गई तो लोग क्या कहेंगे और लोगों की छोड़ो मेरी प्रेमिका धूप को मै क्या जवाब दूंगा ? पर फिर मुझे याद आया कि मेरे और धूप के प्रेम संबंधों में अब दरार आ चुकी है और दूसरे बचे लोग तो अपना वही किशोर दा के गानों पर नाच रहे हैं तो जब मैं इन उलझन से बाहर निकाल एक चादर के अंदर आया तब जरा नींद की कमी महसूस होने के कारण मैंने बैठ जाने का फैसला किया और बगल में रखी किताब उठाई और पढ़ने का नाटक करने लगा किताब एक यात्रा वृतांत थी।
मैं भूले भटके कई किताबें पढ़ लेता हूं मगर आज जब पंखा शांत हुआ और एक प्राणी की आवाज लगातार मेरे कानों में आ रही थी और मैं खोया चला जा रहा था । उस किताब के लेखक मुझे अपने साथ हर उस शहर घूमा रहे थे जहां वो खुद जाते थे तब मुझे अचानक लगा कि यह तो एक बड़ा अलग अनुभव है तब मैंने किताब कुछ क्षणों के लिए नीचे रखी और उसे शांति में खुद को डालने की कोशिश की, तब शायद पहली बार मुझे लगा कि मैं शांति के काबिल नहीं हूं क्योंकि मैं शांति से रूबरू होते हुए भी ना था । वह शांति कितने दिनों से मेरे साथ थी अंदर ही अंदर मुझे यह भी पता था कि शांति मिलेगी कहां मगर फिर भी रोज सवेरे इस शांति को महसूस करने 50 जगह पर रोने रोता था। इसी पर किसी विद्वान आदमी ने कहा था के :
"शांति के चक्कर में मैं सुख खो रहा हूं सबके किस्सों में मैने उसे खोजा और आज खुद रो रहा हूं , मगर न शांति मिली न किस्से ,अब बस फूलों में खत, खतों में किस्से और किस्सों में वह रात किताब और पंखा संजो रहा हूँ।"
जब मैं फिर वह किताब उठाने जा रहा था ,मैंने उस कहानी के पात्र और लेखक बदलने को कहा और मैंने उस कहानी के पात्र बदल भी दिए और लेखक भी खैर उस कहानी को किसी और दिन सुनाऊंगा आज के दिन शांति प्रिय बातें होंगी मगर तभी एक और त्रासदी खड़ी हुई , कि जिसे मैं अभी तक शांति समझ रहा था वह बस एक तूफान से पहले उसका सन्नाटा थी जो अब जाने को तैयार मुझे शायद मालूम न था , नही तो शायद मैं उसे रोकने का प्रयत्न जरूर करता क्योंकि लोगों को रुकने खातिर गिरगिराने में मुझे महारत हासिल है , मगर शांति और सन्नाटा दोनों अपने-अपने रस्ते रवाना हुए , और फिर घुसे तकरीबन 400- 500 लोग (यह अनुमान था शायद ज्यादा थे)।
मेरी दीवारों ने पूछा मगर कहां ?
मेरी तीखी जवान ने आवाज निकाले कहा "मेरे अंदर"!
उन कुकुर लोगों ने मेरे दिल में बड़ा काम कर दिया था और तादाद ज्यादा होने के कारण असर पाचन तंत्र पर भी पड़ा। इन्होंने ऐसा चक्रव्यूह रचा जिसकी सोच में मैं चला गया और शायद उसकी हद मुझे याद न रही और सोच में करीब सभी योनियों के दर्शन हुए जिसके चलते मैं अपने मनुष्य योनि खोजने में निष्फल आ रहा था। पहले मैं एक मछली की योनि में घुसा तब मैंने उसे मरते हुए देख लिया ,कैसे मुंह का निवाला जान ले सकता है यह देख डर के मारे जैसे मैं बाहर निकाला तो मेरी मुलाकात किसी कुत्ते से हुई उसने मुझे खूब आदर सत्कार किया मगर कुछ ही समय बाद उसकी खुशी चिंता में बदल गई क्योंकि उसके मित्र ने उसे जानवर युक्त गाड़ी के बारे में बता दिया है। अब वह शोर फिर शोक के हाथों सूली पर चढ़ता गया और अंतः मर गया । आखिर में मैं जब मनुष्य योनि में पहुंचा तब फिर वही लोग जिन्हें मैंने एक सुंदर जानवर की उपाधि नादानी में दी थी, खैर जब मेरी बात उनसे शुरू हुई तब मुझे पता चला कि वह इस समाज के लोग नहीं थे बल्कि मुझमें अंदर समाय अलग-अलग लोग थे जो बड़े नीच से प्रतीत हो रहे थे और मुझे मेरी जाती पूछ रहे थे और जब मैने अपनी जाति बताई तब मैं उन्हें नीचे नजर आ रहा था । कैसा घनघोर खेल है ना यह जहां कभी नीच मै कभी वो, मगर मुझे मेरी बेवकूफी तब याद आई कि चाहे सही कोई भी हो नीच अंतः मै ही रहूंगा। खैर मानव रूप में आने के बाद जब कुछ देर बाद उन लोगों से विदाई ली तब फिर मुझे कुछ समय मिला एकांत से बात करने का बात करते वक्त मुझे शांति जी ने उत्साहित मन से कहा :
"यह सारा जिस्म झुककर बहुत से अधूरा हुआ होगा ,मैं सजदे मैं नहीं था आपको धोखा हुआ होगा ,
यहां आते-आते सूख जाती है कहीं नदिया मुझे मालूम है पानी कहां ठहरा हुआ होगा ,
गजब यह है कि अपनी मौत की आहट नहीं सुनते वह सब के सब परेशान है वह क्या हुआ होगा तुम्हारे शहर में ईश्वर सुन सुनकर तो लगता है कि इंसानों के जंगल में कोई हांका हुआ होगा "!
यह सब मैं समझ ही रहा था तब तलक मैंने अपने बगल में एक मृत शरीर देखी और पता लगा की शांति तो उनकी बात कर रहीं थीं । मैंने वहां से बाहर निकलने का निर्णय लिया चद्दर तानी और सो गया चुकीं ठंड में मैं और मेरी हैसियत दोनों अभी इसे समझने के काबिल नहीं हैं!
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