कंकड़बाग थाना के बाहर जानो जंक्शन से बातचीत करते अशोक कुमार। (तस्वीर: जानो जंक्शन)
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पटना में ज़मीन लूट का खेल! भतीजी ने भू-माफिया के साथ मिलकर रची साज़िश, बुज़ुर्ग पहुँचे पुलिस दरबार

पटना में 77 वर्षीय बुज़ुर्ग ने भतीजी और कथित भू-माफिया की मिलीभगत से संपत्ति हड़पने का आरोप लगाया है। फर्जी काग़ज़ात, धमकी और कब्ज़े की कोशिशों का दावा करते हुए कंकड़बाग थाना व वरीय अधिकारियों को आवेदन दिया गया है, जिस पर कार्रवाई की मांग की गई है। पूरी रिपोर्ट पढ़ें।

JJ News Desk

पटना के कंकड़बाग थाना क्षेत्र से ज़मीन विवाद से जुड़ा एक सनसनीख़ेज़ मामला सामने आया है। 77 वर्षीय अशोक कुमार ने आरोप लगाया है कि उनकी पटना स्थित कीमती संपत्ति पर परिवार के ही एक सदस्य की भूमिका में फर्जी काग़ज़ात के ज़रिये कब्ज़े की कोशिश की गई, जिसमें भू-माफिया की मिलीभगत होने का भी उन्हें शक है। अशोक कुमार ने इस पूरे मामले को लेकर कंकड़बाग थाना और वरीय पुलिस अधिकारियों को लिखित आवेदन सौंपा है। अशोक कुमार ने जानो जंक्शन से विशेष बातचीत में अपनी आपबीती साझा की है।

अशोक कुमार के अनुसार, वे अविवाहित हैं और उनके कोई संतान नहीं है। उन्होंने बताया कि उनके पिता द्वारा वर्ष 1972 में पटना के संजय नगर और बाइपास क्षेत्र में ज़मीन खरीदी गई थी। पढ़ाई के कारण वे उस समय मुज़फ्फरपुर में थे, इसलिए कुछ ज़मीन उनके भाइयों के नाम दर्ज हुई। बाद में, पारिवारिक सहमति से वर्ष 1974 में बाइपास के उत्तर स्थित, उनके हक़ की, 2.5 कट्ठा ज़मीन उन्हें गिफ्ट डीड के ज़रिये विधिवत हस्तांतरित की गई, जिसकी जमाबंदी उनके नाम से कायम हुई।

“अध्यात्म की तलाश ने मुझे बेघर-सा कर दिया”

जानो जंक्शन से बातचीत में अशोक कुमार ने कहा कि वकालत के दौरान उनका झुकाव अध्यात्म की ओर बढ़ता गया और वे वर्षों तक देशभर में मंदिर-दर-मंदिर भटकते रहे। उनके अनुसार, इसी दौरान परिवार के सदस्यों का व्यवहार उनके प्रति अपमानजनक होता चला गया और उन्हें घर में सम्मान नहीं मिला। अशोक कुमार का दावा है कि इस उपेक्षा और मानसिक दबाव के कारण वे धीरे-धीरे घर से कटते चले गए और यत्र-तत्र भटकने लगे।

उन्होंने बताया कि इस दौरान उनकी तबीयत भी गंभीर रूप से बिगड़ गई। भटकते हुए वे अंततः पटना पहुँचे, जहाँ उनके चचेरे भाई प्रियेरंजन तिवारी ने उन्हें सहारा दिया, अपने घर में आश्रय दिया और अपने खर्च पर इलाज करवाया, जो अब भी जारी है।

ज़मीन बेचने की कोशिश में खुला “फर्जीवाड़े” का राज़

इलाज का खर्च चुकाने के लिए जब अशोक कुमार ने अपनी ज़मीन बेचने की इच्छा जताई, तो उन्हें झटका लगा। राजस्व अभिलेखों में उनकी ज़मीन पर भतीजी मंगेश कुमारी का नाम दर्ज मिला।
अशोक कुमार का दावा है कि सीओ कार्यालय, फुलवारी शरीफ से निकाले गए कागज़ों में एक दानपत्र दिखाया गया, जो कथित रूप से कोलकाता में रजिस्टर्ड बताया गया।

RTI से सामने आया अलग ही सच

अशोक कुमार के अनुसार, जब इस दानपत्र को लेकर कोलकाता रजिस्ट्री ऑफिस से RTI के तहत जानकारी मांगी गई, तो पता चला कि जिस डॉक्यूमेंट नंबर और तारीख का हवाला दिया गया है, वह किसी अन्य व्यक्ति के बीच निष्पादित एक अलग डीड से संबंधित है। उनके दावे के मुताबिक, उसी डीड का दुरुपयोग कर उनके नाम की ज़मीन पर फर्जी दानपत्र तैयार किया गया और जमाबंदी बदलवा ली गई।

जान से मारने की धमकी और ज़मीन पर कब्ज़े का आरोप

विशेष बातचीत में अशोक कुमार ने यह भी कहा कि कथित तौर पर ज़मीन बेचने के लिए तीसरे पक्ष से अनुबंध किए जा चुके हैं और असामाजिक तत्वों के साथ मिलकर ज़मीन पर कब्ज़े की कोशिश हो रही है। उनका आरोप है कि उन्हें और उनके चचेरे भाई को जान से मारने की धमकियाँ मिल रही हैं। इस संबंध में वे पहले भी पुलिस को आवेदन दे चुके हैं।

पुलिस से FIR की मांग

पूरे मामले को लेकर अशोक कुमार ने कंकड़बाग थाना सहित अन्य वरीय पुलिस पदाधिकारियों को लिखित आवेदन सौंपा है। अपने आवेदन में उन्होंने ज़मीन से जुड़े कथित फर्जीवाड़े की जांच कर प्राथमिकी दर्ज करने तथा आवश्यक कानूनी कार्रवाई की मांग की है।
अशोक कुमार का कहना है कि वे ज़मीन के साथ-साथ अपनी और अपने चचेरे भाई की सुरक्षा को लेकर भी आशंकित हैं और प्रशासन से तत्काल हस्तक्षेप की उम्मीद कर रहे हैं।

बिहार में ‘काग़ज़ी मौत’ और ज़मीन हड़पने के आरोप: कोई नया मामला नहीं?

कानूनी जानकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं के अनुसार, बिहार में ज़मीन से जुड़े विवादों में फर्जी दस्तावेज़, दानपत्र और जमाबंदी में हेरफेर के आरोप लगातार सामने आते रहे हैं। विशेषकर बुज़ुर्ग, अकेले रहने वाले या संतानहीन व्यक्तियों की संपत्तियाँ अक्सर विवाद का केंद्र बनती हैं। कई मामलों में पीड़ितों के लंबे समय तक घर से बाहर रहने, बीमारी या पारिवारिक निर्भरता का कथित तौर पर फायदा उठाए जाने के आरोप सामने आए हैं।

‘भू-माफिया’, राजस्व काग़ज़ात और लंबी कानूनी लड़ाई

राजस्व अभिलेखों में नाम चढ़वाने को लेकर होने वाली अनियमितताओं के आरोप भी समय-समय पर उठते रहे हैं। जानकार बताते हैं कि एक बार जमाबंदी बदल जाने के बाद पीड़ित को वर्षों तक कानूनी लड़ाई लड़नी पड़ती है, जबकि इस दौरान ज़मीन की खरीद-बिक्री या कब्ज़े की कोशिशें होती रहती हैं। ऐसे मामलों में पुलिस, अंचल कार्यालय और अदालत—तीनों स्तरों पर लंबी प्रक्रिया पीड़ितों के लिए मानसिक और आर्थिक रूप से बेहद थकाऊ साबित होती है।

(डिस्क्लेमर: यह रिपोर्ट याचिकाकर्ता अशोक कुमार द्वारा जानो जंक्शन को दिए गए साक्षात्कार और उनके द्वारा प्रस्तुत आवेदन/दस्तावेज़ों के आधार पर तैयार की गई है। मामले के आरोप अभी जांचाधीन हैं।) 

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